Friday, 6 October 2017

প্রারব্ধ

हमारे जन्म से लेकर, हमारा जन्म किस परिवार में होगा, ऐसी अनेक घटनाएं हमारे प्रारब्ध के अनुसार घटती हैं । व्यक्ति उस परिवार में जन्म लेता है जिस परिवार की परिस्थिति उसके लिए उसका प्रारब्ध भोगने हेतु अनुकूल हो और उस परिवार के सभी सदस्यों से उसका बडी मात्रा में लेन-देन हो ।
कर्म का सिद्धांत है कि प्रत्येक सकारात्मक कर्म ‘पुण्य’ उत्पन्न करता है और प्रत्येक नकारात्मक कर्म ‘पाप’ उत्पन्न करता है । इसके कारण प्रत्येक व्यक्ति को कर्म का फल भुगतना ही पडता है । जब भी कोई दूसरों के लिए अच्छा कर्म करता है, फलस्वरूप उस व्यक्ति से उसे ‘धन्यवाद’ के साथ-साथ सकारात्मक फल अर्थात सुख भी प्राप्त होता है । जब भी हम किसी को हानि पहुंचाते हैं, उस समय हमें नकारात्मक फल (दु:ख के रूप में) प्राप्त होता है जिसका क्षालन केवल ‘क्षमा करें’, इतना कहने से नहीं होता ।
कर्म का सिद्धांत अपरिवर्तनशील है । कुछ सीमा तक यह न्यूटन की गति के तीसरे सिद्धांत के समान है, जो यह बोध कराता है कि ‘प्रत्येक क्रिया की समतुल्य और विपरीत प्रतिक्रिया होती है । (For every action there is an equal and opposite reaction.)’
जीवन की संपूर्ण यात्रा में हम किसी पुराने लेन-देन को चुका रहे होते हैं अथवा कोई नया लेन-देन बना रहे होते हैं । यह लेन-देन यदि इस जन्म में पूरा नहीं हुआ, तो उसे दूसरे जन्म में पूरा करना पडता है । हमने अपने गत जन्मों में जो लेन-देन बनाए हैं, उस विषय का हमें ज्ञान नहीं होता ।
अगले जन्म में यह भी संभव है कि परिवारवालों के साथ हमारा संबंध और लिंग बदल जाए । इस जन्म में यदि कोई पिता है तो अगले जन्म में वह अपने बेटे की बेटी के रूप में जन्म ले सकता है ।
निम्नलखित उदाहरण से यह स्पष्ट हो जाएगा कि लेन-देन कैसे उत्पन्न होते हैं और कैसे प्रारब्ध बनकर उभरते हैं । यह भी ज्ञात होगा कि साधना से प्रारब्ध के परिणामों को कैसे शिथिल अथवा समाप्त किया जा सकता है ।

Friday, 29 January 2016

ধর্ম ও কর্ম

ধর্ম অর্থে সাধারন ভাবে বলা হয় ধারন করা । কি ধারন করা ,কে ধারন করা , কে ধারন করে ও কিভাবে ধারন করে এসব কথা পরিষ্কার করে না বললে ধর্মের অর্থ বুঝা যাবে না । কে ধারন করে এ কথার উত্তরে মানব ধর্মে মন । কি ধারন করে  তার সংক্ষিপ্ত উত্তর বলা হয় আনন্দ বা শান্তি । মন বিকার শুন্য হয় বা স্থির হয় । এই স্থিরতা যে জাতীয় কর্মের কিছু অনুষ্ঠান কি ভাবে ধারন করে ।
মনের স্থিরতা লাভ মানেই ধর্ম এবং সেই স্থিরতা লাভের জন্য করনীয় কাজ কর্ম । মন এখানে কর্তা ও কর্ম উভয়ই । পার্থিব কর্মে দেহের ভুমিকাই প্রধান । আর অপার্থিব কর্মে মনের ক্রিয়াই প্রধান । এই জন্য ধর্মীয় আলোচনায় মনের গুরত্ব পায় বেশী । কারন মন জড় বস্তু দেহের সাথে যুক্ত তেমনি চেতন বস্তু আত্মার সাথে যুক্ত ।
ধর্মের মুল উদ্যেশ্য মনের সর্ব প্রকার ক্রিয়া রহিত করে পরম ব্রম্ভে লীন হওয়া । মানুষের সমস্ত কর্ম প্রধানতঃ দুটি ভাগে বিভক্ত । এক কামনা বাসনা যুক্ত পার্থিব কর্ম আর অন্য দিকে তা থেকে মুক্ত অপার্থিব কর্ম । প্রথম ভাগের উদ্যেশ্য সংসার জীবন কে সুন্দর করে তোলা । দ্বিতীয় ভাগের উদ্যেশ্য তা থেকে মুক্ত হয়ে মোক্ষ লাভ করা ।